उत्तरप्रदेश में भले ही सरकार माफियाराज खत्म करने के दावे कर रही हो पर सत्ता के संरक्षण में यहाँ माफियाराज हर वक्त हावी रहता हैँ, कभी वन तो कभी खनन और अब शिक्षा माफियाओं से जनता त्रस्त है। इनकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि उनके आगे प्रशासन भी घुटने टेकता है। वक्त है मासूमों के स्कूलों में दाखिले का तो नए शिक्षा सत्र में निजी स्कूल प्रबंधन की मनमानी से मासूम बेबस और परिजन लाचार नजर आने लगे हैं। निजी स्कूलों में शिक्षण शुल्क, प्रवेश शुल्क, यूनिफार्म, किताबें, बसों का संचालन सब कुछ मनमाने तरीके सेअभिभावकों पर थोपा जा रहा है, फिर भी निरंकुश शिक्षा माफियाओं पर नकेल कसना प्रशासन और परिवहन अफसरों के बूते के बाहर हो गया है।
शिक्षा माफिया स्कूल संचालन में खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। इसके बाद भी शिक्षा विभाग, प्रशासन, परिवहन और पुलिस प्रशासन के जिम्मेदार कार्रवाई नहीं कर पाते हैं। कभी कार्रवाई करने का प्रयास किया गया तो कार्रवाई होने तक अफसर के हाथ-पांव ढीले पड़ जाते हैं और पूरी कार्रवाई महज औपचारिक बनकर रह जाती है। अपने राजनीतिक रसूख के बलबूते अधिकतर निजी स्कूल संचालक सत्ता के संरक्षण में पल रहे हैं, इसका फायदा वह स्कूल संचालन में उठाते हैं, जिसका खामियाजा नौनिहालों और उनके परिजनों को जेब ढीली कर भुगतना पड़ता है।
सीजन में एक बार ही खुलती दुकान, वहीं मिलता सामान
शहर के कई निजी स्कूलों की अपनी दुकानें हैं, जहां किताब, कॉपी, यूनिफार्म, जूते, मोजे, बेल्ट सब कुछ मिलता है, वह भी बाजार भाव से करीब तीन गुना महंगा। हर वर्ष शिकायत होती है, लेकिन लाचार अफसर कार्रवाई नहीं कर पाते हैं।स्कूल बसों में नियमों का पालन नहीं होता है। लेकिन परिवहन विभाग के अफसर कार्रवाई नहीं कर पाते हैं।
कई स्कूलों में खेल मैदान नहीं हैं, बच्चों के बैठने को कक्षाएं तक बेहतर नहीं हैं, स्कूल एक्टिविटी के नाम पर हजारों रुपए फीस वसूलने के बाद भी कोई एक्टिविटी नहीं होती है, लेकिन पढ़ने वाले मासूम बेबस और परिजन हैरान रहते हैं कि शिकायत के बाद भी ऐसे स्कूलों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती है। प्रशासन सहित सभी आला अफसर ऐसे शिक्षण संस्थानों पर नकेल कसने की जगह उनमें पहुंचकर उपस्थिति दर्ज कराते हैं। राजनीतिक रसूख के बलबूते पर शिक्षा माफियाओं ने अपनी जड़ें इतनी गहरी जमा ली हैं कि शासन व प्रशासन का कोई भी अफसर उन्हें हिला पाने का दम भी नहीं रखता है। इससे निजी स्कूल महज कमाई का जरिया बनकर रह गए हैं।
सत्ता के संरक्षण में होती लूट
पढ़ाई के नाम पर फीस वसूली के लिए मासूमों को स्कूल में तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है। अब तक ऐसे कई मामलों का खुलासा हुआ, लेकिन हर बार जिला शिक्षा अधिकारी, कलेक्टर, पुलिस अफसर लाचार साबित हुए। क्योंकि इस लूट की छूट शिक्षा माफियाओं को सत्ता के संरक्षण से मिलती है। इससे शिक्षा माफिया के हौसले बढ़ते गए। मौजूदा में निजी स्कूल नियमों को ठेंगा दिखाकर संचालित हो रहे हैं, लेकिन किसी भी स्कूल के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है। अभिभावक जब ज्यादा हल्ला करते हैं तो महज दिखावे के नोटिस और चेतावनी पत्र जारी होते हैं, जो रद्दी साबित होते हैं।